सम्पूर्ण श्री मद् भगवद् गीता ज्ञान यज्ञ
आपके सर्वप्रकारेण परम कल्याण की गारंटी अमृतयोग महाकुम्भ हरिद्वार में सम्पूर्ण गीता ज्ञान यज्ञ
सम्पूर्ण श्री मद् भगवद् गीता की (अठारहों अध्यायों के) सरलतम् एवं ह्रदयग्राही व्याख्या (तन, मनम प्राण, बुद्धि एवं ह्रदय के पूर्ण स्वास्थ्य के लिए प्रतिदिन योगासन, प्राणायाम, द्यान शिविर)
दिनांकः ११ फरवरी २०१० से ६ अप्रैल २०१० तक
स्थानः पंचायती अखाड़ा श्रीनिरंजनी का मेला परिसर
व्यास पीठासीन परमाध्यक्षः विश्वविश्रुत श्री श्री १००८ अखण्ड पीठाधीश्वर महामण्डलेशवर डॉ. स्वामी शाश्वतानन्द गिरि जी महाराज (विद्यावाचस्पति, पी.एच.डी)
प्रियात्मन्
क्या आप मनुष्य होने का अर्थ समझते है? मनुष्य योनि क्यों श्रेष्ठ है? मनुष्य का परम लक्ष्य क्या है? क्या एक दिन आप शरीर छोड़ेंगे? शरीर छोड़ने पर क्या आप पूरे मर जायेंगे या कुछ बचेंगे? क्या आपको निश्चय है कि आप आत्मा रूप से अमर है? शरीर छोड़ने पर भी आत्मा नहीं मरती। फिर उसका क्या होगा? दो ही गतियाँ है। पुनर्जन्म या जीते-जी मुक्ति। क्या आपको इसमें संदेह है? पुनर्जन्म होगा तो आप कहाँ जायेंगे? आप समाज एवं संसार में इतना उँच-नीच, सुख-दुःख, पीड़ा देखते है। यह क्यों है? स्पष्ट है मनुष्य कर्मयोनि है। मनुष्य को ही पाप-पुण्य होता है। वही धर्माचरण करता है। उसको पूर्व जन्म के फल से ही यह सुख-दुःख आदि है। मनुष्य योनि भक्ति का द्वार भी है। विचार करें अपने अपनी सद्गती के लिए क्या किया है।
मरते समय लोग गीता सुनवाने का प्रयास करते है जो व्यर्थ है। आप अभी इसी जीवन में स्वस्थ तन-मन बुद्धि से गंगा तीर्थ में पूरी गीता सुनें और समझें इस सें बड़ा काम क्या हो सकता है। इस काम को मृत्यु न छीन पायेगी। जिन चीजों को मृत्यु छीन लेती है उन कारणों से यदि आप इस गीता ज्ञान से वंचित रहे तो यह बुद्धिमानी नहीं होगी।
अस्तु निश्चय करो सब काम छोड़कर इस परम लाभ के साथ जीवन के परम कल्याण की योजना बनाओ। निश्चित ही ऐसा अवसर फिर आना मुश्किल है।
आपके आवास एवं भोजन की समुचित व्यवस्था रहेगी। स्थान सीमित है। शीघ्रता सें आवेदन पत्र भरकर अपना रजिस्ट्रेशन करवा लें।
न्यूनतम व्यवस्था सहयोग पति-पत्नी इक्यावन सौ रुपये मात्र, एक व्यक्ति इकतिस सौ रुपये मात्र शुल्क।
यह रजिस्ट्रेशन पूर्ण शिविर (दो माह) के लिए ही होगा।

